Monday, May 28, 2018

"लप्रेक" ( लघु प्रेम कथा ) - 1


बस यात्रा का बहुत ज्यादा सौभाग्य मुझे प्राप्त नहीं हुआ I हमारे छोटे से शहर से हमारा बड़ा गांव महज ३५ किमी की दुरी पर था I यदा कदा ही हम बस में गए बाद में माता जी का स्टेटस इम्प्रूव करने के लिए पापा ने स्कूटर ले लियाI फिर हम चारों स्कूटर में ही प्रकृति का आनंद और AC का मजा लेते हुए गांव जाने लगे, हाँ नानी के घर हम हमेशा ट्रैन से ही जाया करते थे और स्टेशन में मामा और भाइयों को खड़ा देख माँ का मुखड़ा गौरान्वित हो जाता था I मानो स्वयं राष्ट्रपति Ronald Reagan आये हों I खैर ट्रेनों में सफर की तो हमने मिसाल कायम की इंजिनीरिंग के दिन मुफिसिलियत भरे होते थे I हर महीने की २० तारीख को पैसे खत्म और जो एक्का दुक्का १० - ५ के नोट किताबो के जिल्द में छुपाये होते थे वो भी २५ के आते आते लुका छिपी खेलते थे Iफिर शुरू होता था उधारियों का दौर मुझे याद है की शायद ही कभी हमने भिलाई से रायपुर का सफर टिकट कटवा कर किया हों Iबड़े ठाट से स्लीपर बोगी में घुसो और ऊपर की खाली सीट में जा के सो जाओ I बचपन से ही बड़ा कौतुहल सा मन में था की साला आखिर ये काले रंग की चौकोर खिड़कियों के अंदर का नजारा कैसा होता होगा ? नौकरी मिलने पर ये जिज्ञासा भी आम हों गयी I एक वाकया जहन में आज भी याद है हमारी ट्रेन भिलाई स्टेशन पहुंचने ही वाली थी मैं दरवाजे पर खड़ा था और मेरे दोस्त मेरे पीछे, तभी टीटी मामा आ गए मित्रों ने BIT में पढने और देश के भविष्य होने का धौंस जमाया I टीटी महोदय शायद मध्य प्रदेश के थे I छत्तीसगढ़ के अलग होने का दुःख शायद उन्हें कुछ ज्यादा ही था लगाया एक जोरदार चांटा I चन्नन्न की आवाज के साथ सब सन्न्न, हमने देर नहीं की तुरंत ही पांचों जेबें टटोल कर ६२ रुपये टीटी जी के हाथों में समर्पित कर दिए I भारत का भविष्य एक चांटे के साथ ही घुटने टेक चूका था Iआज भी जब वो वाकया याद आता है विदेशों में बैठे पहलवानो को याद दिला कर खूब ठहाके मारते हैं I हम पांचों रात भर तीन पत्ती खेला करते थे वो भी मोबाइल में अलार्म लगा कर I फिर रात को ही हारने वाला सब को दुर्ग रेलवे स्टेशन में ट्रीट दिया करता था I ट्रीट में कोल्ड ड्रिंक्स और सुबह सुबह का गरमागरम पोहा हुआ करता था I मगर सुबह सुबह स्टेशन जाने का मजा ही कुछ और था I उंघते हुए यात्री और अलसायी आँखों से उतरते हुए मुसाफिरों के चहरे की रौनक देख कर बड़ा मजा आता था मुझे याद है कोई भी एक बंदा हॉस्टल से घर जाये पूरी की पूरी वानर सेना तैयार हो कर स्टेशन पहुंच जाती थी I मानो बेटी की विदाई हो रही हो I वो दिन भी क्या दिन थे ............ नौकरी लगने के बाद ट्रेन में सफर भी प्रमोशन में बदल गया I कंपनी के पैसों से AC टू टायर का सफर बड़ा ही रौब दार होने लगा Iट्रेन में चढ़ने से पहले रिजर्वेशन चार्ट पर नजर पड़ती थी, आजु बाजु की सीट में कोई २० से २५ साल की "F " मिल जाये तो सफर सितारों के साथ काट जाये I इंग्लिश की मोटी मोटी नोवेल्स, मॅगज़ीन्स और Economic Times जैसे कभी समझ में न आने वाले अखबार खरीद कर खुद को कूल डूड साबित करने की मानो होड़ सी लग गयी I ये सब यूँ ही चलता रहा जब तक की एक बड़ी सी प्राइवेट मल्टीनेशनल कंपनी का जॉइनिंग लेटर नहीं मिला था I फिर ट्रेनों की जगह हवाई जहाज ने ले ली अब फिर से प्रमोशन हुआ अब भाषा में भी बदलाव आ चूका था I सीट बेल्ट बंधने के साथ ही पड़ोस में बैठे सूट पहने अंकल हमे बिज़नेस प्रॉस्पेक्ट नजर आने लगे ................... मनुष्य तरक्की के साथ साथ उदासीन भी बहुत जल्दी हों जाता है और भौतिक वाद की बढ़ती हुई सीमाओं ने उदासीनता के समय को और कम कर दिया है I हवाई जहाज के सफर के दौरान एयर होस्टेस के लुभावने मुखड़े आज शायद ही याद आते हों, मगर माँ के साथ कोयले के इंजन वाली पैसेंजर ट्रेन का वो ४ घंटे का सफर, जिसमे हम " झाल मुढ़ी (आधुनिक भेल ), ५ रुपये के १० समोसे, नमक निम्बू लगे हुए खीरे और नाक को नींद से जगाने वाली चने टमाटर की खुशबू एक लम्बी मुस्कराहट के साथ बड़ी याद आती है I

By I am nature #0004

Sunday, May 27, 2018

Paper Mache Bead Necklace


Hello Readers,

This post is about recycled paper bead jewelry which is not just fun but totally wearable and replaceable to any other metal jewelry available in the market :)
As kids we might have played with paper mache pulp to form different shapes of animals or make some other craft project.

But this is a more professional version of making paper beads even though most of the steps remain the same.

The procedure to make the paper mache is as below

1. Tear the newspaper or any waste paper in small bits of pieces. Alternatively you can even use the toilet paper roll.
2. Soak them in luke warm water for 20-30 mins. Depending on the thickness of the paper the time for soaking depends.
3. Run them through a grinder to make a soft pulp or use a hand blender to pulp them.
4. Now pour them in a sieve and force the excess water out.
5. Take the paper mache pulp and some white glue to it along with some salt. This protects them from catching fungus.
6. Now knead the paste for a while to turn it into soft clay like consistency.
7. And you are ready to make your beads!

Once your beads are have been rolled out, keep them for drying in a warm place for 2-3 days. If the size is make it may take 4 days also depending upon the weather conditions.

Below is the picture of the dried paper beads.



I have not made a hole in the above beads, but i will used a manual driller for the same. Another option is to make hole using a tooth pick when they are still wet. This needs to be done carefully in order not to spoil the shape of the beads.

I usually sand the beads to give it a more finished look and smooth the edges further since its paper it tends to wrinkle when dried out.

Once you are done with all these steps, let your imagination take wings and paint the beads in the color of your choice or you can even create some designs on it.

Enhancement of the beads for the finished look really depends on your imagination and creativity.

Below is the  finished Paper Mache Bead Necklace. I have combined other plastic beads to complement the look. You can any other alternative beads like metal or glass or faux steel. It depends on your design




Hope this post inspires you to take up the project of paper mache jewelry.

It's available for sale on etsy website, below is the link 
https://www.etsy.com/listing/602630172/paper-mache-bead-necklace?ref=related-3

Do write your feedback and queries on the post.

regards,

Bhawna

Friday, May 25, 2018

A Tunnel Through Earth

अगर हम पृथ्वी के केंद्र से होते हुए एक सुरंग बनाये... जो सुरंग पृथ्वी के आर पार होती हो और हम सुरंग में कूद जाए तो.. क्या होगा ?

सबसे पहली बात... ये आपके लिए एक अच्छा अनुभव साबित नही होने वाला है ऑफ़कोर्स पृथ्वी का केंद्र जहाँ तापमान लगभग सूर्य की सतह के बराबर और प्रेशर "30 लाख गाडियो" को सर पे उठाने के बराबर है... वहां किसी इंसान के जीवित रहने की कल्पना नही की जा सकती इतना अधिक प्रेशर आपके फेफड़े को collapse कर देगा और तापमान आपके शरीर को मूलभूत कणो में विखंडित कर देगा I

फिर भी.. As A Thought Experiment... Lets Ignore Temperature & Pressure.. मान लीजिये हम ये सुरंग बना लेते हैऔर... इस ब्लॉग पेज की मालकिन सुश्री  भावना उर्फ़ "भवानी" को इसमें धक्का दे देते है तो क्या होगासबसे पहली बात.. सुरंग का ये सफ़र... बहुत "छिलाऊ" अनुभव होगा?
चूँकि पृथ्वी लगातार अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूम रही है (Including You) तो जब भावना जी इस सुरंग में छलांग लगायेगी .... तो गिरते वक़्त भी उनका शरीर पश्चिम से पूर्व की ओर गतिमान रहेगा पर चूँकि पृथ्वी की निचली सतहें... ऊपरी सतह के मुकाबले धीमी गति से घूमती है इस कारण... गिरते वक़्त भावना जी... सुरंग की दीवारो से रगड़ खाते हुए नीचे गिरेंगी ... जो कि खाल छील देने वाला अनुभव होगा अगर आप एक आम आदमी को ये कष्ट नही देना चाहते तो... ये सुरंग "उत्तरी ध्रुव" से शुरू कर... दक्षिणी ध्रुव पर निकालना सबसे बेहतर उपाय रहेगा क्यों? क्योंकि ध्रुवो पर पृथ्वी का रोटेशन शुन्य है।

तो नार्थ पोल से बनाई जब इस सुरंग में भावना जी गिरेंगी तो सबसे इम्पोर्टेन्ट फैक्टर होगा... Air Friction !!! जब भी हम कोई गेंद फेंकते है तो गेंद हवा के अणुओ से टकरा कर घर्षण के कारण अपना वेग खो के रुक जाती है उसी प्रकार... अगर सुरंग में हवा होगी तो भावना जी एक अधिकतम वेग प्राप्त करने के बाद जैसे जैसे केंद्र की तरफ बढ़ेंगी .. वैसे वैसे उनकी गति शुन्य होती जायेगी केंद्र पर पहुच कर... चूँकि वो ऐसी स्थिति में होंगी .. जहाँ उनके चारो तरफ बराबर मात्रा में मौजूद पृथ्वी का द्रव्यमान उन्हें अपनी तरफ खींच रहा होगा इसलिए केंद्र में जाके भावना जी हवा में भारहीन होके त्रिशंकु की तरह हमेशा के लिए स्थिर हो जायेगी

पर अगर मान लिया जाए कि अगर हम इस सुरंग में किसी तरफ Air Friction Free Vacuum मेन्टेन कर पाते है तो स्थिति कुछ और होगी.... वैक्यूम टनल में... भावना जी का वेग केंद्र तक पहुचते पहुचते 29000 km/hour हो चुका होगा और... भावना जी इस वेग के साथ... केंद्र को सनसनाती गोली की तरह पार कर जायेगे लेकिन... जैसे ही केंद्र को पार करके... भावनाजी... दक्षिणी ध्रुव की तरफ बढ़ेंगी वैसे वैसे... पृथ्वी की ग्रेविटी के कारण उनकी स्पीड कम होनी शुरू हो जायेगी कूदने के लगभग 42 मिनट बाद....दक्षिणी ध्रुव स्थित सुरंग के छोर तक पहुचते पहुचते.. जीरो हो चुकी स्पीड के साथ... भावना जी सुरंग के दूसरे सिरे से निकल कर हवा में दो चार मीटर ऊपर तक निकल जायेगी और अगर उन्हें दूसरे छोर पर खड़े किसी मनुष्य ने अगर "कैच" नही कर लिया तो...
तो.. भावना जी  वापस सुरंग में गिर जाएँगी और उनका सफ़र दोबारा चालु हो जाएगा और ऊपर लिखी प्रक्रिया दोहराई जायेगी और अनंत काल तक भावना जी.. "नार्थ पोल से गिरे, साउथ पोल पे निकले" तथा... "साउथ पोल से गिरे, नार्थ पोल पे निकले" वाली क्रिया दोहराते रहेंगी  !!!
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कहानी खत्म... पैसा हजम !!!

Well... कहीं आप भावना जी को कैच करने की तो नही सोच रहे?

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Thanks For Reading !!!

By I am nature #0003

Thursday, May 24, 2018

Planetary Alignment & Mass Extinctions

एक ना एक दिन... सूर्य के चक्कर लगाते सभी 8 ग्रह... एक सीधी रेखा में आ जायेगे... और जिस दिन ऐसा होगा... उस दिन पृथ्वी पर क़यामत आ जायेगी। सभी ग्रहों का सम्मिलित गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी पर प्रचंड सुनामी तथा भूकंपो को जन्म दे देगा। पृथ्वी फट कर टुकड़ो टुकड़ो में विभक्त हो जायेगी और... पृथ्वी पर मौजूद सभी जीवो को कब्र बन जायेगी।
Hold On A Sec...

अभी जो मैंने कहा... वो ज्योतिषियों, कांस्पीरेसी थ्योरीस्ट, हॉलीवुड मूवीज के निर्देशको की एक बेहतरीन कल्पना के रूप में अक्सर हमारे सामने आती रही है। 5 खगोलीय पिंडो (बुध,मंगल,शुक्र,बृहस्पति,शनि) का एक रेखा में आना प्राचीन सभ्यताओ में निर्माण और विध्वंस का चिन्ह माना जाता था। हिन्दू सभ्यता में इन ग्रहो के एक सीध में आने को युगों में परिवर्तन का चिन्ह माना गया है
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लेकिन.. वैसे 5 ग्रह ही क्यों?
क्योंकि इन 5 ग्रहो को नंगी आँखों से देखा जा सकता है...इन 5 ग्रहों के पार मौजूद ग्रहो को देखने के लिए टेलिस्कोप की जरुरत होती है... इसलिए विश्व की सभी प्राचीन सभ्यताओ को सिर्फ 5 ग्रहो का ही ज्ञान था...
खैर....ग्रहो के एक सीध में आने का कोई विध्वंसक प्रभाव हो सकता है क्या?
उत्तर है.. नही !!!
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First come First...चूँकि ग्रहो का सूर्य के चारो तरफ चक्कर लगाने का पथ (Orbit).... पृथ्वी के ऑर्बिट के सापेक्ष 1-7 डिग्री तक Tilted है... (पूरी तालिका कमेंटबॉक्स में)
इसलिए... ब्रह्माण्ड के इतिहास में... सभी ग्रहो का एक परफेक्ट सीधी रेखा में आ पाना... असंभव है !!!
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सरल शब्दों में... अगर आप सूर्य पर खड़े होकर अपनी आँख की सिधाई में एक रेखा खींचे... तो आपको सोलर सिस्टम के सभी 8 ग्रह एक साथ उस रेखा पर दिख जाए... ये असंभव है। पर हाँ... ये अवश्य संभव है कि...अगर आपकी आँखों से 30 डिग्री का कोण बनाया जाए.. तो संभव है कि सोलर सिस्टम के ज्यादातर ग्रह समय समय पर एक साथ उस 30 डिग्री के एरिया में एक साथ आते रहे... ऐसा पहले भी होता रहा है I अर्थात... रात के आसमान में इन ग्रहो का सीधी रेखा में आना असंभव है लेकिन.. इन ग्रहो को एक दूसरे के आजु बाजू देखा जा सकता है।
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4 फरवरी 1962 को, सूर्य-चंद्रमा-बुध,मंगल,शुक्र,बृहस्पति,शनि... सिर्फ 17 डिग्री के अंतर से... रात के आसमान में... आकाश के एक छोटे से हिस्से में एक साथ और पास पास देखे गए थे। मई 2000 को भी... सोलर सिस्टम के अंदरुनी 5 ग्रह सिर्फ 25 डिग्री के अंतर से एक दूसरे के पास आकर आकाश में लगभग एक सीधी रेखा में आये थे। पर इसका कोई प्रभाव पड़ा होता तो क्या आप आज मेरी पोस्ट पढ़ पा रहे होते?
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नासा ने कैलकुलेट किया है कि.. अगर सोलर सिस्टम के सभी ग्रहो, उल्कापिंडों, धूमकेतुओं, चन्द्रमाओ को एक साथ पृथ्वी के सापेक्ष एक सीधी रेखा में रख दिया जाए तो भी... सभी आकाशीय पिंडो की सम्मिलित ग्रेविटी... पृथ्वी पर आने वाले ज्वार भाटे के स्तर को .04 मिलीमीटर बढ़ाने के अलावा... कुछ और करने में सक्षम नही होगी।
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अगली बार आपको सोलर सिस्टम के अंदरुनी 5 ग्रह आकाश में एक साथ, एक दूसरे के सबसे करीब देखने हो तो.. For Your Calendar... ऐसा 8 सितम्बर 2040 में होगा। अगर आप उस वक़्त तक जीवित होंगे तो मेरी यही सलाह है कि... दुनिया के अंत की गप्पबाजी पे ध्यान ना दें... ज्योतिषियो के चक्कर ना लगाए। अफवाहों को दरकिनार करे।
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Just Relax That Evening...Sit Down...Open Up A Absolute Vodka & Watch Out The Rare Cosmic Planetary Show !!!

Thanks For Reading !!!


By I am nature #0002


Wednesday, May 23, 2018

मेरे आराध्य शिव को अर्पित ...



मन का वैराग जागे जो कभी 
सब आडम्बर त्याग कभी जो मैं
" शिव " हो जाऊँ I
तुम तप के पथ पर मत बढ़ना
वाम अंगिनी का अनुराग त्याग,
तुम मुझमे ही समा, मुझसे ही झरना  
गंगा बन जग शीतल करना II

जहाँ तुम्हारी धार बहेगी 
मैं वहीँ तुमसे जुड़ जाऊंगा I
गंगा लाये कोई भी,
गंगा जाये कहीं भी,

मैं ही तो " गंगाधर " कहलाऊंगा II


By, I am nature #0001


Mutate...Metamorphose...Recycle!!!

Take a closer look at the things you consider "waste" and infuse some creative blood in your veins to transform it into something beautiful!




Hello to readers! Thank you for visiting my page.
Five years back when i quit my job for a short stint in the fashion industry, which didn't carry on for long, i decided to do something. This "something" had no plan or agenda or any motive per say, but yes it was very clear that it had to be something related to art.


Well the usual way for a beginner who is aimless is to jump onto the you tube channel or google something to find a thing that embraces the likes of the mind.But in my case it was my husband who casually told me to do something with the empty lying olive oil bottle (was planning to throw it in the trash, and thank god i didn't).


And that was the beginning of something more meaningful and purposeful in my life when i started seeing these waste bottles in a different light! It gave purpose to each day of my life and new ideas started bubbling in my mind, taking wings in new directions and at times in ways which haven't been tried before by anyone (at least couldn't find a copy on google :/)

“There's always a second chance in life till you are breathing! All you need to do is believe in yourself!.”

Now when i look back to those baby steps i took 5 years back i realize I've come very far and my identity now has changed from a regular Corporate person to an "Artist" or a "Designer". And quite frankly i feel very proud of it :) :)

WHY RECYCLE...??

Sustainability is not just a word but a lifestyle that we need to follow in order to reduce the amount of non-biodegradable waste we generate daily by the use of packaged food or bottles, be it plastic, glass or aluminum.

The data for the amount of waste generated each year that ends up rotting in the land fill for years, is alarming.

So definitely the prime responsibility to reduce the waste lies on us as we need to be more sensible when it comes to environmental issues.

There are hundreds of ways to do that and internet is loaded with lots of solutions, but i won't list them here as this blog is with a different purpose.
If you have the artistic streak in you then go ahead and start painting the empty bottles in your house and use them for decoration or in your garden. They work as perfect accents too if done in particular theme.
I hope you get inspired enough to wake the creative streak in you and get going ;)
Take care and keeping visiting this page!
Bhawna