बस यात्रा का बहुत ज्यादा सौभाग्य मुझे प्राप्त नहीं हुआ I हमारे छोटे से शहर से हमारा बड़ा गांव महज ३५ किमी की दुरी पर था I यदा कदा ही हम बस में गए बाद में माता जी का स्टेटस इम्प्रूव करने के लिए पापा ने स्कूटर ले लियाI फिर हम चारों स्कूटर में ही प्रकृति का आनंद और AC का मजा लेते हुए गांव जाने लगे, हाँ नानी के घर हम हमेशा ट्रैन से ही जाया करते थे और स्टेशन में मामा और भाइयों को खड़ा देख माँ का मुखड़ा गौरान्वित हो जाता था I मानो स्वयं राष्ट्रपति Ronald Reagan आये हों I खैर ट्रेनों में सफर की तो हमने मिसाल कायम की इंजिनीरिंग के दिन मुफिसिलियत भरे होते थे I हर महीने की २० तारीख को पैसे खत्म और जो एक्का दुक्का १० - ५ के नोट किताबो के जिल्द में छुपाये होते थे वो भी २५ के आते आते लुका छिपी खेलते थे Iफिर शुरू होता था उधारियों का दौर मुझे याद है की शायद ही कभी हमने भिलाई से रायपुर का सफर टिकट कटवा कर किया हों Iबड़े ठाट से स्लीपर बोगी में घुसो और ऊपर की खाली सीट में जा के सो जाओ I बचपन से ही बड़ा कौतुहल सा मन में था की साला आखिर ये काले रंग की चौकोर खिड़कियों के अंदर का नजारा कैसा होता होगा ? नौकरी मिलने पर ये जिज्ञासा भी आम हों गयी I एक वाकया जहन में आज भी याद है हमारी ट्रेन भिलाई स्टेशन पहुंचने ही वाली थी मैं दरवाजे पर खड़ा था और मेरे दोस्त मेरे पीछे, तभी टीटी मामा आ गए मित्रों ने BIT में पढने और देश के भविष्य होने का धौंस जमाया I टीटी महोदय शायद मध्य प्रदेश के थे I छत्तीसगढ़ के अलग होने का दुःख शायद उन्हें कुछ ज्यादा ही था लगाया एक जोरदार चांटा I चन्नन्न की आवाज के साथ सब सन्न्न, हमने देर नहीं की तुरंत ही पांचों जेबें टटोल कर ६२ रुपये टीटी जी के हाथों में समर्पित कर दिए I भारत का भविष्य एक चांटे के साथ ही घुटने टेक चूका था Iआज भी जब वो वाकया याद आता है विदेशों में बैठे पहलवानो को याद दिला कर खूब ठहाके मारते हैं I हम पांचों रात भर तीन पत्ती खेला करते थे वो भी मोबाइल में अलार्म लगा कर I फिर रात को ही हारने वाला सब को दुर्ग रेलवे स्टेशन में ट्रीट दिया करता था I ट्रीट में कोल्ड ड्रिंक्स और सुबह सुबह का गरमागरम पोहा हुआ करता था I मगर सुबह सुबह स्टेशन जाने का मजा ही कुछ और था I उंघते हुए यात्री और अलसायी आँखों से उतरते हुए मुसाफिरों के चहरे की रौनक देख कर बड़ा मजा आता था मुझे याद है कोई भी एक बंदा हॉस्टल से घर जाये पूरी की पूरी वानर सेना तैयार हो कर स्टेशन पहुंच जाती थी I मानो बेटी की विदाई हो रही हो I वो दिन भी क्या दिन थे ............ नौकरी लगने के बाद ट्रेन में सफर भी प्रमोशन में बदल गया I कंपनी के पैसों से AC टू टायर का सफर बड़ा ही रौब दार होने लगा Iट्रेन में चढ़ने से पहले रिजर्वेशन चार्ट पर नजर पड़ती थी, आजु बाजु की सीट में कोई २० से २५ साल की "F " मिल जाये तो सफर सितारों के साथ काट जाये I इंग्लिश की मोटी मोटी नोवेल्स, मॅगज़ीन्स और Economic Times जैसे कभी समझ में न आने वाले अखबार खरीद कर खुद को कूल डूड साबित करने की मानो होड़ सी लग गयी I ये सब यूँ ही चलता रहा जब तक की एक बड़ी सी प्राइवेट मल्टीनेशनल कंपनी का जॉइनिंग लेटर नहीं मिला था I फिर ट्रेनों की जगह हवाई जहाज ने ले ली अब फिर से प्रमोशन हुआ अब भाषा में भी बदलाव आ चूका था I सीट बेल्ट बंधने के साथ ही पड़ोस में बैठे सूट पहने अंकल हमे बिज़नेस प्रॉस्पेक्ट नजर आने लगे ................... मनुष्य तरक्की के साथ साथ उदासीन भी बहुत जल्दी हों जाता है और भौतिक वाद की बढ़ती हुई सीमाओं ने उदासीनता के समय को और कम कर दिया है I हवाई जहाज के सफर के दौरान एयर होस्टेस के लुभावने मुखड़े आज शायद ही याद आते हों, मगर माँ के साथ कोयले के इंजन वाली पैसेंजर ट्रेन का वो ४ घंटे का सफर, जिसमे हम " झाल मुढ़ी (आधुनिक भेल ), ५ रुपये के १० समोसे, नमक निम्बू लगे हुए खीरे और नाक को नींद से जगाने वाली चने टमाटर की खुशबू एक लम्बी मुस्कराहट के साथ बड़ी याद आती है I
By I am nature #0004


