मन का वैराग जागे जो कभी
सब आडम्बर त्याग कभी जो मैं
" शिव " हो जाऊँ I
तुम तप के पथ पर मत बढ़ना
वाम अंगिनी का अनुराग त्याग,
तुम मुझमे ही समा, मुझसे ही झरना
गंगा बन जग शीतल करना II
जहाँ तुम्हारी धार बहेगी
मैं वहीँ तुमसे जुड़ जाऊंगा I
गंगा लाये कोई भी,
गंगा जाये कहीं भी,
मैं ही तो " गंगाधर " कहलाऊंगा II
By, I am nature #0001
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