सुनो !!
न किसी के अभाव में जियो
न किसी के प्रभाव में जियो
आप ही की ज़िन्दगी है साहब
आप अपने स्वाभाव में जियो II
बहुतेरे दिन कट गए दूसरों को दिखाने- समझाने में
बड़े चौड़े पापड़ बेले आप ने उन्हें मनाने में
अब लगाएं थोड़ा ध्यान बटर चिकन खाने में
सभी तो लगे हैं अपने अपने घरोंदे बनाने में II
बढ़ी भटकी थी मेरी आत्मा पिछले जनम में
कभी बन्दर, कभी चींटी तो कभी गधे के काम में I
अब जा कर जन्मा हूँ मैं मनुष्य के "अवतार" में,
काहे बिताऊं हर शाम जिस किसी के दरबार में ?
तकिये के नीचे दबा के रखे हैं तुम्हारे ख्याल
एक तस्वीर, बेपनाह इश्क़ और बहुत सारे साल
रोज "संवर" के आया करो मेरी कलम के ख्वाबों में
मैं यूँ ही जी लिया करूँगा आप ही के "स्वभावों" में II
By I am nature #0005
न किसी के अभाव में जियो
न किसी के प्रभाव में जियो
आप ही की ज़िन्दगी है साहब
आप अपने स्वाभाव में जियो II
बहुतेरे दिन कट गए दूसरों को दिखाने- समझाने में
बड़े चौड़े पापड़ बेले आप ने उन्हें मनाने में
अब लगाएं थोड़ा ध्यान बटर चिकन खाने में
सभी तो लगे हैं अपने अपने घरोंदे बनाने में II
बढ़ी भटकी थी मेरी आत्मा पिछले जनम में
कभी बन्दर, कभी चींटी तो कभी गधे के काम में I
अब जा कर जन्मा हूँ मैं मनुष्य के "अवतार" में,
काहे बिताऊं हर शाम जिस किसी के दरबार में ?
तकिये के नीचे दबा के रखे हैं तुम्हारे ख्याल
एक तस्वीर, बेपनाह इश्क़ और बहुत सारे साल
रोज "संवर" के आया करो मेरी कलम के ख्वाबों में
मैं यूँ ही जी लिया करूँगा आप ही के "स्वभावों" में II
By I am nature #0005
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