Monday, June 11, 2018

मेरे आराध्य "शिव" को अर्पित खंड - २

हे महायोगी !
दूर प्रयाग में कहीं
कर रहा कोई
संध्या बाती
प्रिय तेरा 
मन करे अर्पण

मन
एक गोल सिक्का
आरती के थाल में
सिक्कों की खनखन

हे नीलकंठी !
चटक-चटक झर रहा
नीला गगन
सहज शुभ्र हो रही
जाबालि-नगरी
भर रही पनिहरिनें

पंचरंग गगरी..... तुम्हारी "काशी"

By I am nature #0008

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