हे महायोगी !
दूर प्रयाग में कहीं
कर रहा कोई
संध्या - बाती
प्रिय तेरा
मन करे अर्पण
मन
एक गोल सिक्का
आरती के थाल में
सिक्कों की खनखन
हे नीलकंठी !
चटक-चटक झर रहा
नीला गगन
सहज शुभ्र हो रही
जाबालि-नगरी
भर रही पनिहरिनें
पंचरंग गगरी..... तुम्हारी "काशी"
By I am nature #0008
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