Tuesday, July 31, 2018

दोस्त अब थकने लगे हैं

दोस्त अब थकने लगे हैं
किसी का पेट निकल आया है
किसी के बाल पकने लगे हैं

सब पर भारी सी कोई जिम्मेदारी है
सब को छोटी मोटी कोई बीमारी है

दिन भर जो भागते दौड़ते थे
वो अब चलते चलते भी रुकने लगे हैं

पर ये हक़ीक़त है
सब दोस्त थकने लगे हैं
किसी को हाउसिंग लोन की फिक्र है
तो कहीं फूल बॉडी चेक अप का जिक्र है

फुर्सत की सभी को कमी है
आँखों में अजीब सी नमी है

कल तक जो प्यार के खत और मैसेज लिखते थे
आज बीमे के फार्म भरने में लगे हैं

बड़ी कड़वी सी जबान है
अब सब दोस्त थकने लगे हैं ...

By I am nature #0012

Sunday, July 29, 2018

पंच तत्व ...

प्रेम, 
वायु है जो दिखता नहीं
पर होता है महसूस,

जल है जो पारदर्शी है,
जो अपने में सब समेट लेता है
किसी भी रूप में ढल जाता है

ग्नि है,
जब होता है तो रोशनी देता है
ज्यादा हो जाने पर सब जला देता है
खत्म होने पर सिर्फ ख़ाक रह जाता है

आकाश है,
अपार होता है, अनंत होता है
कभी कभी
पहुंच से दूर भी,

पृथ्वी है,
एक खोखली पृथ्वी
जिसमे रहने वाले लोग
चाँद की फरमाइश करते हैं !!
By I am nature #0011

Monday, July 23, 2018

यह मेरा जीवन है ...

जो होता है वो होने दो
यह पौरुश हीन कथन है 
जो चाहेंगे सो ढालेंगे 
यह मेरा जीवन है II

मैं नित नवीन बाधाओं को पार कर
हर बंद विवेचनाओं को त्याग कर 
सदैव लड़ा, लाद कर हर नयी उम्मीद
जीवन चला, चल दौड़ा नित नवीन मार्गों पर 

कभी धूप कढ़ी धूप
झुलसाती बाँहें मेरी 
रंग उड़े, अहं बहा, निर्मम शांत 
भारी बारिश में कहीं

बढ़ा चला जो ठाना कभी 
कर के रहूँगा जो सोचा सभी
श्वांस हो अंतिम हवा में जब

रुकूँगा तभी सोऊँगा जब ...

यह मेरा जीवन है II

By I am nature #0010

Wednesday, June 20, 2018

Life is about being happy internally!

When you are a kid, you always wonder what life would be like after growing up! How fun it is to go to office and not worry about the studies or the school, teachers or all the mundane tasks of a student life!

Little do we realize that those golden days are the best that life will ever ever give you! And when the reality hits, it gets too late too late to flip those pages of life back and enjoy every second and cherish what we had.

I always get these thoughts that why is one always yearning for the past to return, to make things better or to reverse some decisions that we made. Why we never live in the moment, soak ourselves in the present and just swim through life like a pro instead of mulling over the past.
Well our minds have been conditioned to believe in the "not so perfect" scenario all the time right from our birth, that life will be better only if we do certain things, and we lead the entire life struggling to get that one perfect moment which makes sense to our over conditioned sensibilities, which actually is just a bubble! There is no such thing as a perfect day or perfect moment. All is perfect now, whether you have what you desire or you don't. This moment right now is perfect in every sense, cause you are alive, breathing, your cells are responding to you, your body is fighting hundred thousands bacteria in every second, your cells are being repaired, your heart is beating, and your senses are working...in short you are ALIVE!!!

Life is the biggest gift you have and every day when you wake up it is a new opportunity for you to make things wonderful and live your day like their is no tomorrow! To make up for lost things or moments, to give a hug to someone in need, help people in need, and take a step forward to make your dreams come true. We have only 24 hrs in a day and every second counts trust me.

So why repent when life is giving you the chance to take things in a new direction. No day is same, every morning is different and so is the night. When nature doesn't believe in repeating itself then why should we.

We should teach this to even younger ones in the family to learn to be happy first, rest is just life which is all about making efforts constantly and it never stops unless we die.

So start living your day happily with what you have right now, cause nothing is lost till you are alive.

regards


Thursday, June 14, 2018

हमें भारतीयों की गरीबी और कुपोषण क्यों नहीं दिखाई देता ?


एक प्रश्न पूछते है. भारत में आज पैदा हुआ एक बच्चा लगभग 70 वर्ष तक जीवित रहेगा, जबकि वही बच्चा अगर विकसित देशो में पैदा होता तो वह आसानी से 80 वर्ष पार कर जाएगा. दूसरे शब्दों में, भारत में बच्चों को समय से पहले क्यों मरना चाहिए जबकि अगर वे अमीर देशों में पैदा हुए होते, तो वे जीवित रहते.
वर्ष 2015 में अर्थशास्त्र में नोबेल प्राइज विजेता प्रोफेसर एंगस डेटन के अनुसार पश्चिम के पुरुषो और महिलाओं जितनी लम्बाई प्राप्त करने के लिए भारतीय पुरुषो को 200 वर्ष और भारतीय महिलाओं को 500 वर्ष लगेंगे. 
मैंने हाइट का आकड़ा केवल इसलिए दिया की इसे समझना सरल है. बहुत से आंकड़े है जो बताते है की हमारा - भारतीयों का - शारीरिक और मानसिक विकास पीछे रह गया है. हमें भारतीयों की गरीबी और कुपोषण क्यों नहीं दिखाई देता? क्यों?
हमारे शारीरिक विकास में कमी और कुपोषण के क्या कारण है? 
सबसे पहले मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि हमारी अनुवांशिकी या जीन्स का हमारे ठिगने शरीर और कुपोषण में कोई योगदान या जिम्मेवारी नहीं है. अनुवांशिकी कुछ लोगो की हाइट प्रभावित कर सकती है, लेकिन एक बड़ी जनसँख्या में अनुवांशिकी का रोल लम्बाई निर्धारित करने में नगण्य होता है.
एक आम फ़्रांसिसी की हाइट 19 सदी के मध्य में पांच फ़ीट पांच इंच थी, जबकि अब यह पांच फ़ीट दस इंच हो गयी है.
प्रोफेसर डेटन के अनुसार लम्बाई में कमी का प्रमुख कारण बचपने और किशोरावस्था में या तो सही पोषण का अभाव है, या फिर अस्वच्छ वातावरण में रहने का असर है जिसमे अच्छे भोजन के बावजूद बीमारी के बोझ – ध्यान दीजिये, बीमारी के बोझ (ना कि बीमारी) - के कारण एक व्यक्ति समय-समय पर अस्वस्थ रहता है और परिणामस्वरूप शरीर ठिगना रह गया.
अस्वच्छ वातावरण में ना सिर्फ अशुद्ध पानी शामिल है, बल्कि कूड़ा-कचरा और प्रदूषण भी. इस गन्दगी का बोझ ना केवल आम भारतीयों को बीमार रखता है, बल्कि उस बीमारी का बोझ शरीर को निचोड़ देता है. 
बीमार व्यक्ति ना तो नौकरी पे जा पाता है, ना मजूरी या खेती या व्यवसाय कर सकता है. परिणामस्वरूप  पारिश्रमिक ना मिलने या आय ना होने के कारण वह स्वयं और परिवार के लिए भोजन नहीं खरीद सकता जिससे वे सब कुपोषण का शिकार हो जाते है. दुर्बल शरीर के कारण वह पूरी शक्ति से कार्य नहीं कर पाता जिससे कम आय के कारण उसे अन्न और खाद्य सामग्री खरीदने में कठिनाई आती है. एक तरह से वह गरीबी के दुष्चक्र में फंस जाता है.
अगर आप को लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी ने भारत को केवल सुन्दर बनाने के लिए स्वच्छता अभियान चलाया है, गंगा-यमुना को निर्मल बनाने का प्रयास कर रहे है, तो आप आंशिक रूप से सही है. क्या आप को अपने घर के अंदर कूड़ा-कचरा पसंद है?
प्रधानमंत्री मोदी भारत को इसलिए स्वच्छ बनाना चाहते है क्योकि एक स्वच्छ वातावरण हमारे स्वास्थ्य, हमारे कल्याण और हमारी आय के लिए आवश्यक है. अगर भारत वर्ष 2022 तक स्वच्छ हो गया तो हम अगली दो पीढ़ियों में पच्छिमी देशो के नागरिको की तरह स्वस्थ और लम्बे हो जाएंगे.

By I am nature #0009

Monday, June 11, 2018

मेरे आराध्य "शिव" को अर्पित खंड - २

हे महायोगी !
दूर प्रयाग में कहीं
कर रहा कोई
संध्या बाती
प्रिय तेरा 
मन करे अर्पण

मन
एक गोल सिक्का
आरती के थाल में
सिक्कों की खनखन

हे नीलकंठी !
चटक-चटक झर रहा
नीला गगन
सहज शुभ्र हो रही
जाबालि-नगरी
भर रही पनिहरिनें

पंचरंग गगरी..... तुम्हारी "काशी"

By I am nature #0008

Tuesday, June 5, 2018

दिल की "ऑइलिंग ग्रीसिंग"

एक दिन
झाड़ कर देखा उसने
दिल मेरा..
ना जाने क्या-क्या उठाये फिरते हो
कहती है I

ये बरसों पुरानी घिसी-पिटी कहानियाँ
और वो जो अब कोई देखता नहीं
वो बचपन की निशानियाँ II

कितना बोझ हो गया है
लाओ इसे झाड़ कर साफ कर दूँ
धो कर सुखा दूँ धूप में

और फिर से इसे नया सा कर दूँ ...

By I am nature #0007

Saturday, June 2, 2018

Our responsibility as humans!

When i got up in the morning today a lot of tasks were running in my mind which i had set out to achieve in a day, and yes not to mention along with a 2 year old kid! I have always been very optimistic of my capabilities and very ambitious at the same time, even though m well aware than along with a kid even 50% is good percentage to achieve!

Anyways as usual i sat in my balcony soon after getting up to relax for few minutes along with my son. In a split second i saw my son throwing clothes hanging up for drying, off the balcony! That is his usual game...yes pretty much :/ Annoyed as i was i quickly took him inside and went downstairs to pick up those things.

And then i witnessed a very sad picture of a sparrow lying dead on the cemented floor of the parking. Its feathers were not damaged which obviously proves that the reason was something else. It just broke my heart to see something like this in the morning. Well obviously i couldn't leave it just like that, so i went down again, along with a newspaper and wood stick to bury it safely in the society's small garden space.

Many of us have witnessed this in our lives, either on a road side or in our personal spaces of lawns or gardens. The reason for this apart from accidents that are unavoidable is SUMMER SEASON. Of course we can't do much about the weather, but as responsible humans we can place water bowls in a few places like our gardens or spaces outside windows or common areas of the society or community where we live. It takes hardly few minutes but will give you a positive feeling which will make much more happy and trust me kindness always creates ripple effect .This simple act can save lives of many creatures who are helpless when it comes to seeking basic necessities to survive on this planet.

We are cutting tress to build beautiful buildings and spaces but are dooming ourselves to a much dangerous scenario.

It is not that difficult to be a environmental contributor or do things that can help other species survive better.
I hope every reader takes steps to do their small bit, after all more the number of helping hands the better it is for everyone!

Thank you!


अविश्वास की महंगी कीमत हम अपनी जेब से चुकाते है


वर्ष 2016 के अर्थशास्त्र नोबेल पुरुस्कार विजेता ओलिवर हार्ट (उन्होंने नोबेल प्राइज बेन्ग होल्म्स्टॉर्म के साथ शेयर किया था) और सैंडी ग्रॉसमैन ने एक अकादमिक पेपर में प्रश्न पूछा: एक कंपनी के स्वामी को क्या अधिकार है जो एक गैर-स्वामी को प्राप्त नहीं है?
उन्होंने उत्तर दिया कि अगर किसी कंपनी के कॉन्ट्रैक्ट के भविष्य में मिलने वाली किसी भी चुनौती के बारे में एक-एक धारा को साफ़-साफ़ लिखा है, तो उस कंपनी के स्वामी को गैर स्वामी के बदले कोई लाभ नहीं है.
लेकिन कोई भी कॉन्ट्रैक्ट सम्पूर्ण नहीं होता, जिसके कारण कॉन्ट्रैक्ट में लिखी किसी भी धारा के बाहर अगर कुछ घटित होता है तो कंपनी का स्वामी जो चाहे कर सकता है. 
उदाहरण के लिए, किसी कंपनी को दस हज़ार सेल फोन बनाने का कॉन्ट्रैक्ट मिला है. लेकिन वह कंपनी 11 हज़ार सेल फ़ोन बना लेती है और एक हज़ार सेल फ़ोन पे टैक्स नहीं देती. अब यह प्रूव करना होगा कि उस एक हज़ार सेल फ़ोन का उत्पादन गैर क़ानूनी है जिसके लिए कोर्ट जाना पड़ सकता है. कंपनी कह सकती है कि कॉन्ट्रैक्ट पे दस हज़ार स्मार्ट सेल फोन लिखा था और उसने एक हज़ार सामान्य सेल फ़ोन उन्ही दस हज़ार सेल फ़ोन के पुर्जे से बना दिए जो स्मार्ट नहीं है और वह केस जीत सकती है. 
एक तरह से परफेक्ट या सम्पूर्ण कॉन्ट्रैक्ट असंभव है क्योकि हमें मानव स्वाभाव और भविष्य के बारे में कुछ भी पता नहीं है. कंपनी आस्तित्व में इसलिए है क्योकि कंपनी, उपभोक्ता और सरकार के मध्य विश्वास की कमी है. क्योकि कंपनियां ही कॉन्ट्रैक्ट में लिखे के बाहर के (residual claim) क्लेम को अपने फेवर में सुनिश्चित कर सकती है. किसी झगड़े की स्थिति में कोर्ट अलिखित धारा के तहत कंपनी के फेवर में फैसला देगी. जैसा कि भारत में सुप्रीम कोर्ट ने वोडाफोन पे सरकार के 20,000 करोड़ रुपये के टैक्स का केस वोडाफोन के फेवर में दिया.
बाज़ारी शक्ति वस्तुओं के उत्पादन को कम से कम दाम पे सुनिश्चित करती है, जबकि पदानुक्रम या hierarchy समन्वय या ताल-मेल (उत्पादन के हर स्तर को ठीक-ठाक चालू रखना) के दाम को कम करती है.
इस विधा को ट्रांसैक्शन कॉस्ट इकोनॉमिक्स (Transaction Cost Economics) का नाम दिया गया, जिसके अनुसार हर लेन-देन (transaction) की कीमत होती है; जिसमे इस बात का अध्ययन होता है कि कंपनी और बाजार का घाल-मेल कैसे होता है.
लेकिन ब्लॉक चेन तकनीकी के आविष्कार ने इस अपूर्ण कॉन्ट्रैक्ट के कन्सेप्ट को चुनौती दे दी है. कंपनी के स्वामी, सरकार और उपभोक्ता के मध्य हुए कॉन्ट्रैक्ट की एक-एक धारा ब्लॉक चेन पे दर्ज है. बिना तीनो पक्षों की सहमति के कॉन्ट्रैक्ट बदला नहीं जा सकता. अगर किन्ही दो पक्ष के मध्य कोई लेन-देन हुआ है तो ब्लॉक चेन के पूरे नेटवर्क पे सबको पता चल जाएगा जैसे कि वोडाफोन के कितने कस्टमर है, कितना राजस्व प्राप्त हुआ, कितना लाभ हुआ और कितना टैक्स दिया. झगड़े या कोर्ट की कोई जगह ही नहीं है. क्योकि कंपनी अगर केस कोर्ट ले गयी तो वहां उसकी हार सुनिश्चित है.
ब्लॉक चेन में सारे नेटवर्क पे सबको पता चल जाता है कि क्या लेन-देन हुआ है; यह पता चल जाता है कि कंपनी ने जो माल आपको बेचा है उसका स्वामित्व कंपनी के पास है या नहीं; और उस लेन-देन का सबूत ब्लॉक चेन पे रजिस्टर हो जाता है. किसी भी एंट्री को बदलने के लिए उस नेटवर्क पे जुड़े सभी कंप्यूटर पे एंट्री बदलनी होगी.
इस ब्लॉक चेन से कंपनी, सरकार, टैक्स विभाग, बैंक, इन्शुरन्स, ट्रांसपोर्ट, निवेश में हुवे सारे लेन-देन जुड़ जायँगे जिससे व्यवस्था में पूर्ण रूप से पारदर्शिता आ जायेगी.
अब किसान सीधे मंडी और उपभोक्ता से जुड़ जाएगा और उपभोक्ता से मिलने वाले पैसे की सीधे-सीधे जानकारी ले सकेगा.  
चूंकि आने वाले समय में तकनीकी से विश्वास को लागू किया जाएगा, अतः कंपनी, बैंक इत्यादि का आस्तित्व खतरे में आ सकता है.

By I am nature #0006

Friday, June 1, 2018

सुनो !!

सुनो !!

न किसी के अभाव में जियो
न किसी के प्रभाव में जियो
आप ही की ज़िन्दगी है साहब
आप अपने स्वाभाव में जियो II

बहुतेरे दिन कट गए दूसरों को दिखाने- समझाने में
बड़े चौड़े पापड़ बेले आप ने उन्हें मनाने में
अब लगाएं थोड़ा ध्यान बटर चिकन खाने में
सभी तो लगे हैं अपने अपने घरोंदे बनाने में II

बढ़ी भटकी थी मेरी आत्मा पिछले जनम में
कभी बन्दर, कभी चींटी तो कभी गधे के काम में I
अब जा कर जन्मा हूँ मैं मनुष्य के "अवतार" में,
काहे बिताऊं हर शाम जिस किसी के दरबार में ?

तकिये के नीचे दबा के रखे हैं तुम्हारे ख्याल
एक तस्वीर, बेपनाह इश्क़ और बहुत सारे साल
रोज "संवर" के आया करो मेरी कलम के ख्वाबों में
मैं यूँ ही जी लिया करूँगा आप ही के "स्वभावों" में  II

By I am nature #0005

  

Monday, May 28, 2018

"लप्रेक" ( लघु प्रेम कथा ) - 1


बस यात्रा का बहुत ज्यादा सौभाग्य मुझे प्राप्त नहीं हुआ I हमारे छोटे से शहर से हमारा बड़ा गांव महज ३५ किमी की दुरी पर था I यदा कदा ही हम बस में गए बाद में माता जी का स्टेटस इम्प्रूव करने के लिए पापा ने स्कूटर ले लियाI फिर हम चारों स्कूटर में ही प्रकृति का आनंद और AC का मजा लेते हुए गांव जाने लगे, हाँ नानी के घर हम हमेशा ट्रैन से ही जाया करते थे और स्टेशन में मामा और भाइयों को खड़ा देख माँ का मुखड़ा गौरान्वित हो जाता था I मानो स्वयं राष्ट्रपति Ronald Reagan आये हों I खैर ट्रेनों में सफर की तो हमने मिसाल कायम की इंजिनीरिंग के दिन मुफिसिलियत भरे होते थे I हर महीने की २० तारीख को पैसे खत्म और जो एक्का दुक्का १० - ५ के नोट किताबो के जिल्द में छुपाये होते थे वो भी २५ के आते आते लुका छिपी खेलते थे Iफिर शुरू होता था उधारियों का दौर मुझे याद है की शायद ही कभी हमने भिलाई से रायपुर का सफर टिकट कटवा कर किया हों Iबड़े ठाट से स्लीपर बोगी में घुसो और ऊपर की खाली सीट में जा के सो जाओ I बचपन से ही बड़ा कौतुहल सा मन में था की साला आखिर ये काले रंग की चौकोर खिड़कियों के अंदर का नजारा कैसा होता होगा ? नौकरी मिलने पर ये जिज्ञासा भी आम हों गयी I एक वाकया जहन में आज भी याद है हमारी ट्रेन भिलाई स्टेशन पहुंचने ही वाली थी मैं दरवाजे पर खड़ा था और मेरे दोस्त मेरे पीछे, तभी टीटी मामा आ गए मित्रों ने BIT में पढने और देश के भविष्य होने का धौंस जमाया I टीटी महोदय शायद मध्य प्रदेश के थे I छत्तीसगढ़ के अलग होने का दुःख शायद उन्हें कुछ ज्यादा ही था लगाया एक जोरदार चांटा I चन्नन्न की आवाज के साथ सब सन्न्न, हमने देर नहीं की तुरंत ही पांचों जेबें टटोल कर ६२ रुपये टीटी जी के हाथों में समर्पित कर दिए I भारत का भविष्य एक चांटे के साथ ही घुटने टेक चूका था Iआज भी जब वो वाकया याद आता है विदेशों में बैठे पहलवानो को याद दिला कर खूब ठहाके मारते हैं I हम पांचों रात भर तीन पत्ती खेला करते थे वो भी मोबाइल में अलार्म लगा कर I फिर रात को ही हारने वाला सब को दुर्ग रेलवे स्टेशन में ट्रीट दिया करता था I ट्रीट में कोल्ड ड्रिंक्स और सुबह सुबह का गरमागरम पोहा हुआ करता था I मगर सुबह सुबह स्टेशन जाने का मजा ही कुछ और था I उंघते हुए यात्री और अलसायी आँखों से उतरते हुए मुसाफिरों के चहरे की रौनक देख कर बड़ा मजा आता था मुझे याद है कोई भी एक बंदा हॉस्टल से घर जाये पूरी की पूरी वानर सेना तैयार हो कर स्टेशन पहुंच जाती थी I मानो बेटी की विदाई हो रही हो I वो दिन भी क्या दिन थे ............ नौकरी लगने के बाद ट्रेन में सफर भी प्रमोशन में बदल गया I कंपनी के पैसों से AC टू टायर का सफर बड़ा ही रौब दार होने लगा Iट्रेन में चढ़ने से पहले रिजर्वेशन चार्ट पर नजर पड़ती थी, आजु बाजु की सीट में कोई २० से २५ साल की "F " मिल जाये तो सफर सितारों के साथ काट जाये I इंग्लिश की मोटी मोटी नोवेल्स, मॅगज़ीन्स और Economic Times जैसे कभी समझ में न आने वाले अखबार खरीद कर खुद को कूल डूड साबित करने की मानो होड़ सी लग गयी I ये सब यूँ ही चलता रहा जब तक की एक बड़ी सी प्राइवेट मल्टीनेशनल कंपनी का जॉइनिंग लेटर नहीं मिला था I फिर ट्रेनों की जगह हवाई जहाज ने ले ली अब फिर से प्रमोशन हुआ अब भाषा में भी बदलाव आ चूका था I सीट बेल्ट बंधने के साथ ही पड़ोस में बैठे सूट पहने अंकल हमे बिज़नेस प्रॉस्पेक्ट नजर आने लगे ................... मनुष्य तरक्की के साथ साथ उदासीन भी बहुत जल्दी हों जाता है और भौतिक वाद की बढ़ती हुई सीमाओं ने उदासीनता के समय को और कम कर दिया है I हवाई जहाज के सफर के दौरान एयर होस्टेस के लुभावने मुखड़े आज शायद ही याद आते हों, मगर माँ के साथ कोयले के इंजन वाली पैसेंजर ट्रेन का वो ४ घंटे का सफर, जिसमे हम " झाल मुढ़ी (आधुनिक भेल ), ५ रुपये के १० समोसे, नमक निम्बू लगे हुए खीरे और नाक को नींद से जगाने वाली चने टमाटर की खुशबू एक लम्बी मुस्कराहट के साथ बड़ी याद आती है I

By I am nature #0004

Sunday, May 27, 2018

Paper Mache Bead Necklace


Hello Readers,

This post is about recycled paper bead jewelry which is not just fun but totally wearable and replaceable to any other metal jewelry available in the market :)
As kids we might have played with paper mache pulp to form different shapes of animals or make some other craft project.

But this is a more professional version of making paper beads even though most of the steps remain the same.

The procedure to make the paper mache is as below

1. Tear the newspaper or any waste paper in small bits of pieces. Alternatively you can even use the toilet paper roll.
2. Soak them in luke warm water for 20-30 mins. Depending on the thickness of the paper the time for soaking depends.
3. Run them through a grinder to make a soft pulp or use a hand blender to pulp them.
4. Now pour them in a sieve and force the excess water out.
5. Take the paper mache pulp and some white glue to it along with some salt. This protects them from catching fungus.
6. Now knead the paste for a while to turn it into soft clay like consistency.
7. And you are ready to make your beads!

Once your beads are have been rolled out, keep them for drying in a warm place for 2-3 days. If the size is make it may take 4 days also depending upon the weather conditions.

Below is the picture of the dried paper beads.



I have not made a hole in the above beads, but i will used a manual driller for the same. Another option is to make hole using a tooth pick when they are still wet. This needs to be done carefully in order not to spoil the shape of the beads.

I usually sand the beads to give it a more finished look and smooth the edges further since its paper it tends to wrinkle when dried out.

Once you are done with all these steps, let your imagination take wings and paint the beads in the color of your choice or you can even create some designs on it.

Enhancement of the beads for the finished look really depends on your imagination and creativity.

Below is the  finished Paper Mache Bead Necklace. I have combined other plastic beads to complement the look. You can any other alternative beads like metal or glass or faux steel. It depends on your design




Hope this post inspires you to take up the project of paper mache jewelry.

It's available for sale on etsy website, below is the link 
https://www.etsy.com/listing/602630172/paper-mache-bead-necklace?ref=related-3

Do write your feedback and queries on the post.

regards,

Bhawna

Friday, May 25, 2018

A Tunnel Through Earth

अगर हम पृथ्वी के केंद्र से होते हुए एक सुरंग बनाये... जो सुरंग पृथ्वी के आर पार होती हो और हम सुरंग में कूद जाए तो.. क्या होगा ?

सबसे पहली बात... ये आपके लिए एक अच्छा अनुभव साबित नही होने वाला है ऑफ़कोर्स पृथ्वी का केंद्र जहाँ तापमान लगभग सूर्य की सतह के बराबर और प्रेशर "30 लाख गाडियो" को सर पे उठाने के बराबर है... वहां किसी इंसान के जीवित रहने की कल्पना नही की जा सकती इतना अधिक प्रेशर आपके फेफड़े को collapse कर देगा और तापमान आपके शरीर को मूलभूत कणो में विखंडित कर देगा I

फिर भी.. As A Thought Experiment... Lets Ignore Temperature & Pressure.. मान लीजिये हम ये सुरंग बना लेते हैऔर... इस ब्लॉग पेज की मालकिन सुश्री  भावना उर्फ़ "भवानी" को इसमें धक्का दे देते है तो क्या होगासबसे पहली बात.. सुरंग का ये सफ़र... बहुत "छिलाऊ" अनुभव होगा?
चूँकि पृथ्वी लगातार अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूम रही है (Including You) तो जब भावना जी इस सुरंग में छलांग लगायेगी .... तो गिरते वक़्त भी उनका शरीर पश्चिम से पूर्व की ओर गतिमान रहेगा पर चूँकि पृथ्वी की निचली सतहें... ऊपरी सतह के मुकाबले धीमी गति से घूमती है इस कारण... गिरते वक़्त भावना जी... सुरंग की दीवारो से रगड़ खाते हुए नीचे गिरेंगी ... जो कि खाल छील देने वाला अनुभव होगा अगर आप एक आम आदमी को ये कष्ट नही देना चाहते तो... ये सुरंग "उत्तरी ध्रुव" से शुरू कर... दक्षिणी ध्रुव पर निकालना सबसे बेहतर उपाय रहेगा क्यों? क्योंकि ध्रुवो पर पृथ्वी का रोटेशन शुन्य है।

तो नार्थ पोल से बनाई जब इस सुरंग में भावना जी गिरेंगी तो सबसे इम्पोर्टेन्ट फैक्टर होगा... Air Friction !!! जब भी हम कोई गेंद फेंकते है तो गेंद हवा के अणुओ से टकरा कर घर्षण के कारण अपना वेग खो के रुक जाती है उसी प्रकार... अगर सुरंग में हवा होगी तो भावना जी एक अधिकतम वेग प्राप्त करने के बाद जैसे जैसे केंद्र की तरफ बढ़ेंगी .. वैसे वैसे उनकी गति शुन्य होती जायेगी केंद्र पर पहुच कर... चूँकि वो ऐसी स्थिति में होंगी .. जहाँ उनके चारो तरफ बराबर मात्रा में मौजूद पृथ्वी का द्रव्यमान उन्हें अपनी तरफ खींच रहा होगा इसलिए केंद्र में जाके भावना जी हवा में भारहीन होके त्रिशंकु की तरह हमेशा के लिए स्थिर हो जायेगी

पर अगर मान लिया जाए कि अगर हम इस सुरंग में किसी तरफ Air Friction Free Vacuum मेन्टेन कर पाते है तो स्थिति कुछ और होगी.... वैक्यूम टनल में... भावना जी का वेग केंद्र तक पहुचते पहुचते 29000 km/hour हो चुका होगा और... भावना जी इस वेग के साथ... केंद्र को सनसनाती गोली की तरह पार कर जायेगे लेकिन... जैसे ही केंद्र को पार करके... भावनाजी... दक्षिणी ध्रुव की तरफ बढ़ेंगी वैसे वैसे... पृथ्वी की ग्रेविटी के कारण उनकी स्पीड कम होनी शुरू हो जायेगी कूदने के लगभग 42 मिनट बाद....दक्षिणी ध्रुव स्थित सुरंग के छोर तक पहुचते पहुचते.. जीरो हो चुकी स्पीड के साथ... भावना जी सुरंग के दूसरे सिरे से निकल कर हवा में दो चार मीटर ऊपर तक निकल जायेगी और अगर उन्हें दूसरे छोर पर खड़े किसी मनुष्य ने अगर "कैच" नही कर लिया तो...
तो.. भावना जी  वापस सुरंग में गिर जाएँगी और उनका सफ़र दोबारा चालु हो जाएगा और ऊपर लिखी प्रक्रिया दोहराई जायेगी और अनंत काल तक भावना जी.. "नार्थ पोल से गिरे, साउथ पोल पे निकले" तथा... "साउथ पोल से गिरे, नार्थ पोल पे निकले" वाली क्रिया दोहराते रहेंगी  !!!
.
कहानी खत्म... पैसा हजम !!!

Well... कहीं आप भावना जी को कैच करने की तो नही सोच रहे?

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Thanks For Reading !!!

By I am nature #0003